GKTodayHindi

प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए Latest GK + नई भर्ती अपडेट

CG Savara Tribe in Hindi

savara janjati chhattisgarh history culture in hindi

छत्तीसगढ़ की सवरा जनजाति: इतिहास, संस्कृति, रहन-सहन और महत्वपूर्ण तथ्य

छत्तीसगढ़ अपनी समृद्ध जनजातीय संस्कृति और विविधता के लिए जाना जाता है। राज्य की प्रमुख प्राचीन जनजातियों में से एक ‘सवरा जनजाति’ (Savara Tribe) है। प्रतियोगी परीक्षाओं (CGPSC, CG Vyapam, CGSSB) की दृष्टि से सवरा जनजाति से जुड़े प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं। इस लेख में हम सवरा जनजाति के निवास क्षेत्र, उत्पत्ति, समाज, संस्कृति और परंपराओं के बारे में विस्तार से जानेंगे।

1. सवरा जनजाति का परिचय एवं निवास क्षेत्र

सवरा भारत की एक अत्यंत प्राचीन जनजाति है, जो मुख्य रूप से कोलारियन (Kolarian) समूह के अंतर्गत आती है।
  • प्रमुख राज्य: यह जनजाति छत्तीसगढ़ के अलावा ओडिशा (उड़ीसा), आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और झारखंड में निवास करती है।
  • छत्तीसगढ़ में विस्तार: छत्तीसगढ़ में सवरा जनजाति मुख्य रूप से रायगढ़, महासमुंद और बिलासपुर जिलों में निवास करती है।
  • जनसंख्या एवं साक्षरता (जनगणना 2011 के अनुसार):
    • कुल जनसंख्या: 1,30,709 (जिसमें पुरुष 64,769 तथा महिलाएं 65,940 हैं)।
    • साक्षरता दर: 65.0% (पुरुष साक्षरता 76.4% और महिला साक्षरता 53.9%)।

2. उत्पत्ति एवं पौराणिक मान्यताएं

सवरा जनजाति की उत्पत्ति को लेकर कई पौराणिक मान्यताएं और दंतकथाएं प्रचलित हैं:
  • रामायण एवं महाभारत से संबंध: सवरा जनजाति के लोग अपनी उत्पत्ति रामायण काल की भक्त शबरी से मानते हैं। वहीं, महासमुंद जिले के सवरा अपनी उत्पत्ति रामायण काल के वानरराज सुग्रीव से मानते हैं। महाभारत में भी इनका उल्लेख ‘सबर’ जाति के रूप में मिलता है।
  • प्रचलित दंतकथा (महादेव और नंदी की कथा): एक लोककथा के अनुसार, भगवान महादेव ने मनुष्य को खेती सिखाने के लिए एक हल बनाया और सबर (सवरा) जाति के पूर्वज को कुल्हाड़ी देकर जंगल के पेड़ काटकर जमीन साफ करने को कहा। महादेव अपने वाहन नंदी को वहीं छोड़कर हल में जोतने के लिए दूसरा बैल लेने चले गए। पेड़ काटते समय सबर को तेज भूख लगी और खाने को कुछ न मिलने पर उसने नंदी को मारकर उसका मांस खा लिया। जब महादेव वापस लौटे, तो साफ जंगल देखकर उन्होंने प्रसन्न होकर सबर को मंत्र-तंत्र और जड़ी-बूटी का ज्ञान दिया। परंतु बाद में मरे हुए नंदी को देखकर महादेव ने क्रोधित होकर शाप दिया कि “तुम और तुम्हारे वंशज सदैव भूखे रहेंगे।” मान्यता है कि तभी से गरीबी इस जनजाति के साथ जुड़ी हुई है।

3. सामाजिक संरचना: उपजातियां एवं गोत्र

छत्तीसगढ़ में सवरा जनजाति का समाज पितृवंशीय, पितृसत्तात्मक और पितृ निवास स्थानीय होता है।
  • प्रमुख उपजातियां: छत्तीसगढ़ में सवरा जनजाति की मुख्यतः 3 उपजातियां पाई जाती हैं, जो अंतःविवाही समूह हैं:
    1. कला पीड़िया (बड़े सावरा)
    2. आड़े सवरा
    3. ठाकुर सवरा (छोटे सवरा)
  • प्रमुख गोत्र एवं टोटम: इनकी उपजातियां विभिन्न गोत्रों में बंटी हैं और प्रत्येक गोत्र का अपना एक टोटम (प्रतीक) होता है। प्रमुख गोत्र हैं— भैंसा, भोई, बाघ, कुंदला, वनमूला, बींछी, बगुला (हंसराज), नाग, कलशा, सूरजवंशी, गुरिया, बाहरा, भटिया, हथिया आदि।

4. आवास, वेशभूषा एवं खान-पान

  • घर एवं बसाहट: सवरा जनजाति के लोग ग्राम में बिंझवार, कंवर, कोंध, खड़िया जैसी जनजातियों तथा अघरिया, कोलता, अहीर, नाई आदि जातियों के साथ मिलकर रहते हैं। इनके घर सामान्यतः मिट्टी के बने होते हैं, जिन पर घास-फूस या देशी खपरैल का छप्पर होता है। दीवारों पर सफेद या पीली मिट्टी से पुताई की जाती है और फर्श को गोबर से लीपा जाता है। घरों में अनाज रखने की कोठी, जांता, ढेकी, मूसल और मछली पकड़ने का ‘चोरिया’ जैसे घरेलू उपकरण होते हैं।
  • वेशभूषा एवं आभूषण: पुरुष पंछा और बंडी पहनते हैं, जबकि महिलाएं लुगड़ा और ब्लाउज पहनती हैं। महिलाएं बाल लंबे रखकर जूड़ा बनाती हैं और शरीर के विभिन्न अंगों (हाथ, पैर, गले, नाक, कान) में गोदना (Tattoo) गुदवाती हैं तथा गिलट, चांदी व पीतल के गहने पहनती हैं।
  • भोजन एवं पेय: इनका मुख्य भोजन कोदो या चावल का पेज, भात, बासी, मौसमी साग-भाजी और उड़द, मूंग व अरहर की दाल है। ये मांसाहारी भी होते हैं। पुरुष व महिलाएं महुआ से बनी शराब का सेवन करते हैं और पुरुष तेंदू या अन्य पत्ते में तंबाकू लपेटकर ‘चोंगी’ पीते हैं।

5. जीवन संस्कार (जन्म, विवाह और मृत्यु)

जन्म संस्कार

  • इस जनजाति में गर्भवती महिलाएं प्रसव के दिन तक अपने सामान्य कामकाज करती हैं। प्रसव घर पर ही बुजुर्ग महिलाओं की देखरेख में कराया जाता है।
  • नवजात शिशु की नाल को ‘सुतई’ (सीप) से काटा जाता है।
  • प्रसूता को स्वस्थ रखने के लिए कुलथी की दाल, खम्हार की छाल का काढ़ा, सोंठ, पीपर, गुड़ और नारियल खाने को दिया जाता है। छठे दिन (छठी) घर की लिपाई-पुताई कर जच्चा-बच्चा को स्नान कराया जाता है और नए कपड़े पहनाए जाते हैं।

विवाह संस्कार

  • विवाह का प्रस्ताव वर पक्ष की ओर से जाता है। लड़कों के विवाह की आयु 14-18 वर्ष और लड़कियों की 12-16 वर्ष मानी जाती है।
  • सूक (वधूधन): वर के पिता द्वारा वधू के पिता को वधूधन (सूक) के रूप में 2 खण्डी चावल, 20 किलो दाल, 5 किलो गुड़, 3 किलो चिवड़ा, 50 रुपये और 8 साड़ी दी जाती है।
  • विवाह संपन्न कराने वाला: विवाह की रस्म समाज के बुजुर्ग व्यक्ति या ‘गारिया’ (बैगा) द्वारा संपन्न कराई जाती है।
  • अन्य प्रचलित विवाह: सामान्य विवाह के अलावा इनमें विनिमय विवाह, सेवा विवाह और विधवा पुनर्विवाह (चूड़ी पहनाना) को भी सामाजिक मान्यता प्राप्त है।

मृत्यु संस्कार

  • मृत्यु होने पर शव को जलाने की प्रथा है और अस्थियों को महानदी में विसर्जित किया जाता है।
  • तीसरे दिन परिवार के पुरुष सिर, दाढ़ी और मूंछ का मुंडन कराते हैं। मृत्यु भोज तीसरे या दसवें दिन दिया जाता है।

6. आर्थिक जीवन (अर्थव्यवस्था)

सवरा जनजाति की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि मजदूरी और वनोपज संग्रह पर टिकी है।
  • इनकी कृषि भूमि असिंचित और कम होने के कारण ये धान, कोदो, उड़द, तिल और अरहर जैसी फसलें बोते हैं।
  • जंगल से कंदमूल, भाजी के अलावा महुआ, डोरी (महुआ बीज), गुल्ली, चार, तेंदू, हर्रा, लाख, गोंद, तेंदू पत्ता और सरई बीज एकत्र कर बाजार में बेचते हैं।

7. धार्मिक मान्यताएं, पंचायत एवं कला-संस्कृति

  • प्रमुख देवी-देवता: सवरा जनजाति के प्रमुख आराध्य भगवान जगन्नाथ, ठाकुर देव, दुल्हादेव, करिया धुरूवा, माता देवाला, घटवालिन, शबर-शबरी, साहड़ा देव, भैंसासुर, समलाई मंगला, खड़ापाठ और परूआपाठ हैं। ये तंत्र-मंत्र और जादू-टोना में भी गहरा विश्वास रखते हैं।
  • प्रमुख त्यौहार एवं नृत्य-गीत: इनके प्रमुख पर्व रथयात्रा, हरियाली, नागपंचमी, जन्माष्टमी, नवाखानी, दशहरा, दिवाली और होली हैं। होली में ये ‘फाग’ गाते हैं और ‘रहस’ नाचते हैं। इसके अलावा भजन, रामधुनी, रामायण के साथ-साथ युवा वर्ग कभी-कभी करमा और ददरिया गीत भी गाते हैं।
  • परंपरागत जाति पंचायत: समाज के आंतरिक विवादों (विवाह, तलाक, उत्तराधिकार) को सुलझाने के लिए इनकी अपनी जाति पंचायत होती है:
    • मुक्कदम: पंचायत का प्रमुख होता है।
    • दीवान: मुक्कदम का सहयोगी होता है।
    • कई गांवों को मिलाकर ‘परगना जाति पंचायत’ बनती है, जिसमें सभापति और कोषाध्यक्ष होते हैं जो अंतरजातीय विवाह जैसे गंभीर विवादों का निपटारा करते हैं।

परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य (One-Liner Facts for CGPSC/Vyapam,CGSSB)

विशेषता प्रमुख तथ्य
भाषा/समूह
कोलारियन समूह
प्रमुख निवास क्षेत्र
रायगढ़, महासमुंद, बिलासपुर
उत्पत्ति
रामायण की शबरी एवं वानरराज सुग्रीव से
प्रमुख उपजातियां
कला पीड़िया, आड़े सवरा, ठाकुर सवरा
नवजात की नाल काटने का साधन
सुतई (सीप)
वधूधन का नाम
सूक
विवाह संपन्न कराने वाला
गारिया (बैगा)
जाति पंचायत प्रमुख
मुक्कदम (प्रमुख) एवं दीवान (सहयोगी)
प्रमुख आराध्य देव
भगवान जगन्नाथ, ठाकुर देव, समलाई मंगला, शबर-शबरी

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: छत्तीसगढ़ में सवरा जनजाति मुख्य रूप से किन जिलों में पाई जाती है?
उत्तर: छत्तीसगढ़ में सवरा जनजाति मुख्य रूप से रायगढ़, महासमुंद और बिलासपुर जिलों में निवास करती है।
प्रश्न 2: सवरा जनजाति की परंपरागत पंचायत के प्रमुख को क्या कहा जाता है?
उत्तर: सवरा जनजाति की जाति पंचायत के प्रमुख को ‘मुक्कदम’ और उसके सहयोगी को ‘दीवान’ कहा जाता है।
प्रश्न 3: सवरा जनजाति में वधूधन और पुरोहित को किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर: इस जनजाति में वधूधन को ‘सूक’ तथा विवाह संपन्न कराने वाले बैगा को ‘गारिया’ कहा जाता है।
प्रश्न 4: सवरा जनजाति में नवजात शिशु की नाल किससे काटी जाती है?
उत्तर: नवजात शिशु की नाल ‘सुतई’ (सीप) से काटी जाती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *