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छत्तीसगढ़ का नामकरण और इतिहास | CGPSC Notes

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Table of Contents

छत्तीसगढ़ राज्य का नामकरण और इतिहास: प्रथम प्रयोग एवं प्रमुख मत

छत्तीसगढ़ राज्य का नामकरण और इतिहास प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण विषय है। CGPSC, CG Vyapam, CGSSB तथा अन्य राज्य स्तरीय परीक्षाओं में छत्तीसगढ़ के प्राचीन नाम, ‘छत्तीसगढ़’ शब्द की उत्पत्ति, इसके प्रथम प्रयोग और विभिन्न इतिहासकारों के मतों से संबंधित प्रश्न पूछे जा सकते हैं।

प्राचीन काल में वर्तमान छत्तीसगढ़ क्षेत्र को मुख्य रूप से दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था। समय के साथ इस क्षेत्र का उल्लेख विभिन्न ग्रंथों, शिलालेखों, ताम्रपत्रों और साहित्यिक रचनाओं में अलग-अलग नामों से मिलता है।

इस लेख में छत्तीसगढ़ के नामकरण से संबंधित प्रमुख ऐतिहासिक तथ्यों, विद्वानों के मतों और परीक्षा उपयोगी प्रश्नों का अध्ययन करेंगे।

1. छत्तीसगढ़ के प्राचीन नाम एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

छत्तीसगढ़ का इतिहास प्राचीन भारतीय सभ्यता, संस्कृति और साहित्य से जुड़ा हुआ है। अलग-अलग कालखंडों में इस क्षेत्र के लिए विभिन्न नामों का प्रयोग किया गया।

प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं:

  • कोसल: प्राचीन साहित्य में प्रयुक्त प्रमुख नाम।
  • दक्षिण कोसल: वर्तमान छत्तीसगढ़ तथा आसपास के क्षेत्रों से संबंधित ऐतिहासिक नाम।
  • महाकोसल: इस क्षेत्र के लिए कुछ इतिहासकारों द्वारा प्रयुक्त नाम।
  • महाकांतार: प्राचीन साहित्यिक एवं ऐतिहासिक संदर्भों में मिलने वाला नाम।
  • दण्डकारण्य: रामायण परंपरा से जुड़ा विस्तृत वन क्षेत्र, जिसका कुछ भाग वर्तमान छत्तीसगढ़ में स्थित है।
  • चक्रकोट: बस्तर क्षेत्र के ऐतिहासिक संदर्भों में प्रयुक्त नाम।

कोसल और दक्षिण कोसल

‘कोसल’ शब्द का संबंध प्राचीन भारतीय ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परंपरा से है। प्राचीन ग्रंथों में उत्तर कोसल और दक्षिण कोसल का उल्लेख मिलता है।

रामायण की परंपरा में उत्तर कोसल का संबंध अयोध्या और राजा दशरथ से जोड़ा जाता है, जबकि दक्षिण कोसल का संबंध वर्तमान छत्तीसगढ़ क्षेत्र के ऐतिहासिक भूभाग से माना जाता है।

महाभारत के सभा पर्व में भी कोसल क्षेत्र का उल्लेख मिलता है। विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में दक्षिण कोसल की सीमाओं और विस्तार के विषय में अलग-अलग विवरण मिलते हैं।

प्रमुख तथ्य

  • छत्तीसगढ़ का प्राचीन ऐतिहासिक नाम दक्षिण कोसल माना जाता है।
  • ‘कोसल’ का उल्लेख प्राचीन साहित्य में मिलता है।
  • दण्डकारण्य का संबंध रामायण की परंपरा से है।
  • ह्वेनसांग के यात्रा विवरण से प्राचीन भारत के अनेक क्षेत्रों के ऐतिहासिक भूगोल की जानकारी मिलती है।
  • वर्तमान छत्तीसगढ़ का प्राचीन भूभाग समय-समय पर विभिन्न राजवंशों के अधीन रहा।

2. शिलालेखों एवं ताम्रपत्रों में दक्षिण कोसल का उल्लेख

छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास को समझने के लिए शिलालेख, ताम्रपत्र और प्रशस्तियाँ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत हैं। इनसे तत्कालीन शासकों, प्रशासन, राजवंशों और क्षेत्रीय नामों की जानकारी प्राप्त होती है।

प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत

1. प्रयाग प्रशस्ति

समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति के रचयिता हरिषेण थे। इस अभिलेख में दक्षिण कोसल सहित दक्षिणापथ के विभिन्न राज्यों और शासकों का उल्लेख मिलता है।

2. रतनपुर शिलालेख

कलचुरी शासकों के इतिहास के अध्ययन में रतनपुर के अभिलेख महत्वपूर्ण हैं। जाजल्यदेव प्रथम से संबंधित अभिलेखों में दक्षिण कोसल के ऐतिहासिक संदर्भ मिलते हैं।

3. कुरुसपाल शिलालेख

बस्तर क्षेत्र के इतिहास और तत्कालीन शासकों की जानकारी के लिए कुरुसपाल शिलालेख महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके संदर्भ में सोमेश्वर देव का नाम मिलता है।

4. रायपुर ताम्रपत्र

प्राचीन छत्तीसगढ़ के इतिहास में ताम्रपत्रों का विशेष महत्व है। रायपुर ताम्रपत्र से संबंधित विवरणों में कोसल नाम का उल्लेख मिलता है।

परीक्षा नोट: किसी अभिलेख की तिथि, पंक्ति संख्या और उसमें प्रयुक्त सटीक शब्दों से संबंधित प्रश्नों के लिए मूल अभिलेख या प्रमाणित इतिहास ग्रंथ से पुष्टि अवश्य करें।

3. छत्तीसगढ़ के नामकरण पर प्रमुख विद्वानों के मत

‘छत्तीसगढ़’ नाम की उत्पत्ति के विषय में इतिहासकारों और विद्वानों ने अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं। इन मतों को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए जानना उपयोगी है।

1. अलेक्जेंडर कनिंघम

अलेक्जेंडर कनिंघम एक प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता थे। उनके नाम के साथ छत्तीसगढ़ क्षेत्र को ‘महाकोसल’ कहे जाने का मत जोड़ा जाता है।

उनके द्वारा वर्णित क्षेत्र की सीमाओं के संबंध में अलग-अलग ऐतिहासिक विवरण मिलते हैं।

2. रायबहादुर हीरालाल

रायबहादुर हीरालाल के मत के अनुसार ‘छत्तीसगढ़’ शब्द का संबंध ‘चेदिसगढ़’ नाम से माना गया है। इस मत में चेदि वंश के ऐतिहासिक प्रभाव को नामकरण से जोड़ा जाता है।

3. जे. बी. बेगलर

जे. बी. बेगलर एक पुरातत्व सर्वेक्षणकर्ता थे और कनिंघम के साथ भी कार्य कर चुके थे। उनसे संबंधित एक मत में ‘छत्तीस घर’ की अवधारणा के आधार पर छत्तीसगढ़ नाम की व्याख्या की जाती है।

इस मत को नामकरण की एक व्याख्या के रूप में पढ़ना चाहिए, न कि निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य के रूप में।

4. चिज्म का मत

चिज्म से संबंधित मत के अनुसार कलचुरी शासक कल्याण साय द्वारा 36 गढ़ों की व्यवस्था से इस क्षेत्र के नामकरण को जोड़ा जाता है। इस विवरण में शिवनाथ नदी के उत्तर और दक्षिण में 18-18 गढ़ों का उल्लेख मिलता है।

5. डॉ. शंकर शेष

डॉ. शंकर शेष के मत में छत्तीसगढ़ नाम का अर्थ छत्तीस किलों अथवा गढ़ों के क्षेत्र से संबंधित माना जाता है।

6. लोचन प्रसाद पांडेय

लोचन प्रसाद पांडेय ने छत्तीसगढ़ क्षेत्र के ऐतिहासिक विस्तार के संबंध में व्यापक सीमाओं का उल्लेख किया है। उनके नाम से संबंधित भौगोलिक विवरणों का अध्ययन करते समय मूल स्रोत का संदर्भ लेना उपयोगी है।

7. खैरागढ़ के लाल प्रद्युम्न

इस मत के अनुसार प्राचीन काल में इस क्षेत्र में 36 राजाओं की 36 राजधानियाँ होने की धारणा को छत्तीसगढ़ नाम से जोड़ा जाता है।

8. कैप्टन ब्लंट

कैप्टन ब्लंट का नाम छत्तीसगढ़ क्षेत्र के ऐतिहासिक यात्रा-विवरणों के संदर्भ में लिया जाता है। उनके यात्रा-वृत्तांत से संबंधित विवरणों में ‘छत्तीसगढ़’ नाम का उल्लेख महत्वपूर्ण माना जाता है।

महत्वपूर्ण: नामकरण के इन मतों में से किसी एक को अंतिम रूप से प्रमाणित उत्पत्ति मानने के बजाय इन्हें अलग-अलग ऐतिहासिक व्याख्याओं के रूप में समझना चाहिए।

4. छत्तीसगढ़ शब्द का प्रथम प्रयोग

छत्तीसगढ़ शब्द का प्रथम प्रयोग किसने और कब किया, यह प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण विषय है। इस संबंध में अलग-अलग पुस्तकों और परीक्षा-नोट्स में भिन्न विवरण मिल सकते हैं।

प्रचलित परीक्षा-नोट्स में निम्नलिखित नाम और तिथियाँ दी जाती हैं:

  • 1487 ई.: राजकवि दलपत राव द्वारा प्रशस्ति में छत्तीसगढ़ शब्द के प्रयोग का उल्लेख।
  • 1494 ई.: खैरागढ़ के राजा लक्ष्मीनिधि राय के चारण कवि दलराम राव से संबंधित उल्लेख।
  • 1746 ई.: गोपाल मिश्र की रचना ‘खूब तमाशा’ में राजनीतिक संदर्भ में प्रयोग का उल्लेख।
  • 1795 ई.: ब्रिटिश कालीन अभिलेखों और यात्रा-विवरणों से संबंधित उल्लेख।
  • 1896 ई.: बाबू रेवाराम की रचना ‘विक्रम विलास’ से संबंधित उल्लेख।
  • 1909 ई.: रायपुर गजेटियर में उल्लेख का विवरण।

इन तिथियों को पढ़ते समय प्रथम साहित्यिक प्रयोग, राजनीतिक प्रयोग और सरकारी अभिलेख में प्रयोग के बीच अंतर करना आवश्यक है। इनके संबंध में परीक्षा में प्रयुक्त सटीक उत्तर के लिए मानक छत्तीसगढ़ इतिहास ग्रंथ तथा संबंधित मूल स्रोत का मिलान करें।

5. छत्तीसगढ़ नामकरण से संबंधित महत्वपूर्ण सारणी

विद्वान / स्रोत संबंधित नाम या मत
प्राचीन ऐतिहासिक परंपरा कोसल, दक्षिण कोसल
रामायण परंपरा उत्तर कोसल, दक्षिण कोसल
महाभारत का सभा पर्व कोसल से संबंधित उल्लेख
प्राचीन साहित्यिक संदर्भ महाकांतार, दण्डकारण्य
अलेक्जेंडर कनिंघम से संबंधित मत महाकोसल
रायबहादुर हीरालाल से संबंधित मत चेदिसगढ़
जे. बी. बेगलर से संबंधित मत छत्तीस घर
चिज्म से संबंधित मत 36 गढ़ों की अवधारणा
डॉ. शंकर शेष से संबंधित मत छत्तीस किले या गढ़
कैप्टन ब्लंट यात्रा-विवरण में छत्तीसगढ़ का उल्लेख

6. CGPSC और CG Vyapam के लिए महत्वपूर्ण वन-लाइनर

  1. छत्तीसगढ़ का प्राचीन ऐतिहासिक नाम — दक्षिण कोसल।
  2. प्रयाग प्रशस्ति के रचयिता — हरिषेण।
  3. प्रयाग प्रशस्ति किस शासक से संबंधित है — समुद्रगुप्त।
  4. ‘छत्तीसगढ़’ नाम की एक प्रमुख प्रचलित व्याख्या — छत्तीस गढ़ों का क्षेत्र।
  5. रतनपुर का इतिहास किस राजवंश से विशेष रूप से जुड़ा है — कलचुरी राजवंश।
  6. बस्तर क्षेत्र के ऐतिहासिक नामों में एक नाम — चक्रकोट।
  7. दण्डकारण्य का संबंध किस महाकाव्य की परंपरा से है — रामायण।
  8. छत्तीसगढ़ नामकरण पर विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग मत दिए हैं — सही।
  9. प्राचीन अभिलेखों से किस प्रकार की जानकारी मिलती है — शासकों, प्रशासन और ऐतिहासिक भूगोल की।
  10. नामकरण से संबंधित तिथियों और प्रथम प्रयोग के प्रश्नों में मूल स्रोत का सत्यापन क्यों जरूरी है — क्योंकि विभिन्न संदर्भों में अलग-अलग प्रकार के प्रथम प्रयोग बताए जाते हैं।

7. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1. छत्तीसगढ़ का प्राचीन नाम क्या था?

उत्तर: छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास में दक्षिण कोसल नाम का विशेष महत्व है।

प्रश्न 2. छत्तीसगढ़ नाम का अर्थ क्या माना जाता है?

उत्तर: एक प्रचलित मत के अनुसार इसका अर्थ छत्तीस गढ़ों या किलों का क्षेत्र माना जाता है।

प्रश्न 3. प्रयाग प्रशस्ति किसने लिखी थी?

उत्तर: प्रयाग प्रशस्ति की रचना हरिषेण ने की थी। यह समुद्रगुप्त से संबंधित है।

प्रश्न 4. छत्तीसगढ़ शब्द का प्रथम प्रयोग किसने किया था?

उत्तर: इस संबंध में विभिन्न परीक्षा-नोट्स में दलपत राव और दलराम राव के नाम तथा अलग-अलग तिथियाँ मिलती हैं। इसलिए सटीक परीक्षा-उत्तर के लिए मानक संदर्भ पुस्तक से पुष्टि करनी चाहिए।

प्रश्न 5. CGPSC परीक्षा के लिए यह विषय क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर: छत्तीसगढ़ के प्राचीन नाम, शिलालेख, ताम्रपत्र, इतिहासकारों के मत और नामकरण से संबंधित तथ्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में उपयोगी हैं।

निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ के नामकरण का इतिहास इसकी प्राचीन सांस्कृतिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ है। दक्षिण कोसल, कोसल, महाकोसल और दण्डकारण्य जैसे नाम इस क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान को समझने में मदद करते हैं। वहीं, छत्तीसगढ़ शब्द की उत्पत्ति को लेकर विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं।

CGPSC, CG Vyapam और CGSSB की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों को इन नामों, ऐतिहासिक स्रोतों और विद्वानों के मतों का नियमित अभ्यास करना चाहिए।

अस्वीकरण: यह लेख शैक्षणिक एवं प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। विवादित ऐतिहासिक तिथियों और नामकरण संबंधी मतों को अंतिम तथ्य मानने से पहले प्रमाणित स्रोतों से सत्यापित करें।

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